सुकमा. तमाम सुख-सुविधाओं के बाद भी सफलता जिन्हें नहीं मिलती वे इसे भाग्य समझने की भूल कहते हैं उनके लिए बस्तर के नक्सल प्रभावित सुकमा जिले की बेटी रिया के संघर्ष से सीखना चाहिए. जिले के नक्सल प्रभावित गांव से निकलकर और गरीबी के बीच पढ़ाई पूरी कर रिया अब लंदन के एक सरकारी अस्पताल में नौकरी कर रही है. सैलरी भी कोई 20 या 40 हजार नहीं, सीधे एक लाख 80 हजार रुपये का.
जी हां, ये आपके चौंकने के लिए काफी है. लेकिन, उससे भी ज्यादा चौंकने की बात रिया फिलिप का वहां तक पहुंचने का सफर है. जिन बाधाओं को पार करते हुए उसने ये सफलता हासिल की है, वह अपने आप में मिसाल है. पिता भी पहले ऑटो चलाते थे और अब एक प्राइवेट स्कूल में बस चलाते हैं. जबकि मां एक प्राइवेट स्कूल में टीचर हैं.
लाल आतंक के खौफ से छोड़ना पड़ा था गांव
पहले रिया का परिवार सुकमा जिले के नक्सल प्रभावित दुब्बाटोटा गांव में रहता था. इसी के कारण उन्हें गांव छोड़कर दोरनापाल जाना पड़ा. रिया की पढ़ाई के लिए पिता संजू फिलिप ने पहले ऑटो चलाई. अब एक निजी स्कूल में स्कूल बस के ड्राइवर की नौकरी कर रहे हैं. रिया की पढ़ाई पहली से आठवीं तक दोरनापाल के एक इंग्लिश मीडियम स्कूल में हुई. जबकि नौवीं से 12वीं तक की पढ़ाई जगदलपुर में पूरी की.तमाम आर्थिक संकट के बाद भी पिता ने उसे बीएससी नर्सिंग की पढ़ाई के लिए बेंगलुरु भेजा.
ऐसे खुला सफलता का ताला
रिया ने नर्सिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद मुंबई में कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में सेवा शुरू की. वह लगातार ड्यूटी के बाद ओईटी परीक्षा ऑक्यूपेशनल इंग्लिश टेस्ट की तैयारी करने लगी. बाद में वह घर आ गई और वहीं इस परीक्षा की तैयारी में जुटी रही. आखिरकार उसे सफलता मिली. अब वह लंदन के बेट्सी कैडवाल्डर विश्वविद्यालय स्वास्थ में बतौर आइसीयू नर्स के तौर पर काम शुरू कर दिया है. वहां सैलरी ही 1 लाख 80 हजार रुपये पर मंथ है. इधर, परिवार में खुशी का माहौल है और लोग बधाइयां देने पहुंच रहे हैं.
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