बिलासपुर. छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने डॉक्टर प्रवेश शुक्ला के सेवा समाप्ति आदेश को अवैध करार देते हुए निरस्त कर दिया है. राज्य शासन द्वारा अनुशासनहीनता और सेवा में कमी का आरोप लगाते हुए 08 अगस्त 2024 को उनकी सेवा समाप्त कर दी गई थी. कोर्ट ने माना कि आदेश पारित करने से पहले डॉक्टर शुक्ला को सुनवाई का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया, न ही विभागीय जांच की गई. न्यायमूर्ति ए.के. प्रसाद की सिंगल बेंच ने यह आदेश पारित किया.
सेवा समाप्ति पर उठाए गंभीर सवाल
डॉ. शुक्ला ने याचिका में कहा कि उन्हें बिना किसी जांच और उचित सुनवाई के कलंकपूर्ण तरीके से नौकरी से हटाया गया. उन्होंने अपनी याचिका में उल्लेख किया कि वह एक सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर हैं, जिन्होंने एम्स भोपाल और जी.बी. पंत सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, दिल्ली जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में सेवाएं दी हैं. छत्तीसगढ़ लौटकर उन्होंने अपनी विशेषज्ञता राज्य के जरुरतमंद मरीजों की सेवा में लगाने का फैसला किया. उनकी सेवा समाप्ति का निर्णय राज्य शासन द्वारा पारदर्शिता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है.
अनवर ढेबर का इलाज और विवाद की जड़
मामला जून 2024 का है, जब शराब घोटाले के आरोपी विचाराधीन बंदी अनवर ढेबर को इलाज के लिए जिला अस्पताल में लाया गया. वहां लोअर जीआई एंडोस्कोपी (कोलोनोस्कोपी) मशीन की अनुपलब्धता के चलते डॉ. प्रवेश शुक्ला ने उन्हें एम्स रेफर कर दिया. राज्य शासन ने इस कार्रवाई को अनुशासनहीनता मानते हुए छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम 1965 का उल्लंघन करार दिया और उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं. डॉक्टर ने आरोप खारिज करते हुए कहा कि वह इस उपकरण के विशेषज्ञ नहीं हैं और ऐसे में यह निर्णय मरीज के सर्वोत्तम हित में था.
कानूनी कार्रवाई और सुप्रीम कोर्ट का हवाला
डॉ. शुक्ला ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में याचिका दायर कर आदेश को चुनौती दी. उनके अधिवक्ता संदीप दुबे ने तर्क दिया कि राज्य शासन ने बिना विभागीय जांच के और सुनवाई का अवसर दिए बिना सेवा समाप्ति का आदेश पारित किया, जो सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों का उल्लंघन है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा गया कि संविदा नियुक्तियों में भी कलंकपूर्ण आदेश पारित करने से पहले उचित जांच और सुनवाई आवश्यक है.
कोर्ट का फैसला और आदेश निरस्तीकरण
सुनवाई के बाद कोर्ट ने माना कि डॉक्टर प्रवेश शुक्ला की सेवा समाप्ति का आदेश बिना सुनवाई और जांच के पारित किया गया, जो कानून के अनुसार अवैध है. सिंगल बेंच ने 08 अगस्त 2024 के आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि राज्य शासन को यदि शिकायत है, तो उचित विभागीय जांच करके निष्पक्ष रूप से मामले को निपटाना चाहिए. यह फैसला डॉक्टर के करियर के लिए राहतभरा है और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की आवश्यकता को रेखांकित करता है.
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