टिप्पणी। आज की भाषा में इसे क्या कहते हैं, रायता फैलाना! अगर ऐसा होता है तो इसके जिम्मेदार वन एंड ओनली राहुल गांधी होंगें। गुलामनबी आजाद और दूसरे बागी नेता जो कर रहें हैं या अभी और करेंगे उसका कोई महत्व नहीं है। ये सारे लोग हांका देने वाले हैं। पुराने लोग हैं तो जानते होंगे कि पहले शेर के शिकार के लिए हांका लगाया जाता था। बहुत सारे लोग जंगल में खाली पीपे, ढोल बजाते हुए शेर को घेर कर उस जगह लाने का प्रयास करते थे जहां मचान पर शिकारी बैठा होता था।
BJP है शिकारी !
भाजपा शिकारी है। कई सालों से राहुल को घेरने की कोशिश में लगी हुई है। अब ये सही हांके वाले भी मिल गए हैं। अब फैसला राहुल पर है। देखना है कि वे क्या करते हैं। खुद का शिकार होने देते हैं। या आप में से जो भी शिकार के बारे में जानते हैं या अथेंटिक सुना या पढ़ा है वह जानते होंगे कि कभी-कभी शेर पलट कर भी आता है। मचान टूट जाती है और हांके वाले उल्टे पांव भागने लगते हैं।
यह राहुल को देखना है कि उन्हें अब क्या करना है। यह ऐसा ऐतिहासिक मोड़ है जहां कांग्रेस और कमजोर भी हो सकती है या पलट कर वापस मजबूती की और भी बढ़ सकती है। सारा खेल राहुल पर है। वे अच्छे खिलाड़ी हैं। मगर एमेच्योर ( शौकिया)। जैसे पहले होते थे। दो तरह के एमेच्योर और प्रोफेशनल। एमेच्योर खिलाड़ियों में किलिंग इन्सटिंट नहीं होता था। शौक के लिए खेलते थे। मजे के लिए, मगर जब खेलों में प्रोफेशनलिज्म आया तो फिर खिलाड़ी जीत के लिए खेलने लगे। मोहम्मद अली, पेले, मेराडोना, मार्टिना नवरात्रिलोवा, मैकनरो और अभी जैसे हार्दिक पंड्या। लास्ट बालों पर छक्का!
इन्हें भगवान भी नहीं समझा सकते
कांग्रेस बड़ी तैयारी कर रही है। एक साथ दो बड़े प्रोग्राम हो गए। यात्रा तो थी ही। इसमें पता नहीं कैसे महंगाई पर दिल्ली में एक रैली भी आयोजित कर ली। कांग्रेस के लोगों को कौन समझाए! कहते हैं, इन्हें भगवान भी नहीं समझा सकता। अपने घर में कोई बड़ा आयोजन करने वाला भी जानता है कि सारा ध्यान इस पर देना है इससे तीन दिन पहले कोई और कार्यक्रम नहीं रखना है।
राहुल गांधी की यात्रा
मगर राहुल की भारत यात्रा जो निश्चित ही रूप से एक ऐतिहासिक इवेंट है और कांग्रेस के लिए गेम चेंजर भी साबित हो सकती है। उससे पहले महंगाई पर जनसभा का क्या मतलब है! बोला तो आजकल हर चीज को रैली जाता है। मगर है तो आमसभा ही। पिछली बार दिल्ली में नहीं करने दी थी तो जयपुर में की। इस बार भी क्या गारंटी की आखिरी टाइम में इसकी परमिशन वापस नहीं ले ली जाएगी? खैर वह अलग मुद्दा है। मगर उस पर इतनी शक्ति खर्च हो रही है कि अगर सफल हो जाएगी, मतलब भीड़ ठीक ठाक आ जाएगी तो सामान्य बात मानी जाएगी।
लेकिन अगर जैसा कि, दिल्ली के बार्डरों को बंद करने से लोग नहीं आ पाते तो मीडिया के लिए चांदी हो जाएगी। राहुल का फ्लाफ शो से कम तो क्या हेंडिंग लगेंगे। इससे आगे कि कोई कल्पना नहीं कर सकता कि राहुल को फेल साबित करने के लिए कैसे कैसे शाब्दिक वमन (वोमिट आफ वर्ड) होंगे।
राहुल की भारत जोड़ो यात्रा
आक्रमण इसलिए तेज होगा कि, 7 सितम्बर से शुरू हो रही उनकी भारत जोड़ो यात्रा को तोड़ना है। यात्रा का टेम्पो ( माहौल) नहीं बनने देना है। कांग्रेसी यह भूल रहे हैं कि पिछले आठ साल में उनका सबसे बड़ा प्रोग्राम यह है। यही कांग्रेस की समस्या है। यात्रा पांच साल पहले भी शुरु हो सकती थी। इस यात्रा के संयोजक दिग्विजय सिंह ने जब 2017 में अपनी नर्मदा यात्रा शुरु की थी तो वे उससे पहले राहुल गांधी से मिलने गए थे और उनसे ऐसी ही भारत पद यात्रा शुरु करने को कहा था। मगर उस पर गौर करना तो दूर की बात दिग्विजय की छह महीने से ज्यादा चली यात्रा में उन्हें शामिल भी नहीं होने दिया गया। कई बार प्रोग्राम बना और हर बार उसे कैसिंल करवाने वाले ज्यादा सफल साबित हुए।
दिग्विजय ने एक बार कहा था कि मुझे मध्य प्रदेश के शेरों से डर नहीं लगता मगर यहां के ( दिल्ली के) चूहों से लगता है! मतलब जो अंदर कब क्या कुतर जाएं पता ही नहीं चले। दिग्विजय की यात्रा ने मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार पलट दी थी। अगर उस समय राहुल भारत यात्रा पर निकल गए होते तो 2019 का नतीजा क्या होता यह तो कहना अब ठीक नहीं है, मगर इतना जरूर कहा जा सकता है कि 52 से तो ज्यादा मिलतीं। सौ के आंकड़े तक पहुंचना कोई बड़ी बात नहीं थी।
2014 में भी कांग्रेस इतनी कम सीटों 44 पर खुद अपने नेताओं के कारण आई थी। उन्होंने ही पार्टी का हौसला तोड़ा था। आज मनीष तिवारी में इतनी बात करने की हिम्मत इसलिए आई है कि 2014 में उनसे किसी ने कुछ कहा नहीं। सोनिया गांधी ने माफ कर दिया। उसी का नतीजा है कि आज वे कांग्रेस के नेताओं को चपरासी कह रहे हैं और साथ में एक वीभत्स और वल्गर हंसी हंस रहे हैं। कभी किसी पार्टी में किसी ने सुना नेता खुद ही चुनाव लड़ने से मना कर दे? मनीष ने चुनाव लड़ने से मना करके कांग्रेस का मनोबल तोड़ दिया था। सब जगह मैसेज चला गया कि कांग्रेस हार रही है। मंत्री चुनाव लड़ने से डरा। उसके बाद भी कांग्रेस ने उन्हें 2019 में नई सीट आनंदपुर साहब से टिकट देकर जितवाया।
कांग्रेस की ज्यादा शराफत उसकी कमजोरी बन गई है। राहुल नेक आदमी हैं। गजब की धीरज वाले, हिम्मती और अपनी आलोचना सुनने से नहीं घबराने वाले। मगर यह सारे व्यक्तिगत गुण हैं। राजनीति में आपका ध्यान लक्ष्य पर होना चाहिए और यहां लक्ष्य एक ही है। सत्ता हासिल करना। राहुल यहीं ऐकेडिमक हो जाते हैं। आदर्शवादी, अव्यवहारिक।
अध्यक्ष बनने को तैयार नहीं!
सारा खेल यहीं पर है। पार्टी का सारा दारोमदार राहुल के इसी एक फैसले पर टिका हुआ है। यहां राहुल के पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं। केवल दो। एक खुद दूसरे प्रियंका। बाकी विकल्प नहीं कहलाते। वे तो बरबादी है। कांग्रेस का मजाक बनवाना है। राहुल को समझना चाहिए कि कांग्रेस को बचाने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी उनके उपर है। अगर चूक गए तो इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करेगा।
शशि थरुर चुनाव लडेंगे !
इससे बड़ी शर्म की बात क्या होगी? क्या छवि है थरुर की? टाम ब्वाय की! या जनता को केटल क्लास ( जानवर) बोलने की। और निश्चित जानिए कांग्रेस के अध्यक्ष पद का मजाक उड़ाने के लिए ऐसे ऐसे लोगों को नामांकन भराने लाया जाएगा कि कांग्रेसियों को शर्म आ जाएगी। मामले मुकदमे की तो सारी गुंजाइशें रखी ही जाएंगी।
ये 4 सितंबर की महंगाई विरोधी रैली, 7 सितम्बर से शुरू हो रही भारत जोड़ो यात्रा सब की शोभा और कामयाबी तभी है जब इनका नेतृत्व, केन्द्रीय भूमिका कांग्रेस का होने वाला अध्यक्ष निभा रहा हो। यह नहीं हो सकता कि अध्यक्ष कोई और हो और नेता राहुल गांधी हों। इन्दिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं तब अध्यक्ष कोई और चल सकता था। लेकिन अगर इन्दिरा प्रधानमंत्री नहीं होतीं और अध्यक्ष कोई और होता तो आज इन्दिरा गांधी का नाम इतिहास में कहीं नहीं होता। नमस्कार राहुल जी!
शकील अख्तर, वरिष्ठ पत्रकार
(Disclaimer: यह पोस्ट फेसबुक से ली गई है, लेखक जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं। वे सोशल मीडिया पर बेबाकी से खुले खत व लेख लिखने के लिए भी जानें जाते हैं। लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह हैं। इसके लिए Newsbaji किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है।)
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